Thursday, 20 July 2023

वो अपनी मनमानी करती है : बलवंत सिंह राणा

वो अपनी मनमानी करती
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वो अपनी मनमानी करती
फिर भी अच्छी लगती
डाांट जब भी लगती
माां की झलक दिखलाती

नजरों में प्यार भरा जैसे
जीवन को रोशन कर देती
बचपन लौट आता 
जब वो मुस्कुराती

अपना हुकुम नित चलाती सब पर
लेकिन जब वो आांगन में नहीं दिखती
सूना सारा आांगन लगता पल भर में
उसके आने से जीवन में प्राण आते

वो जब भी आती मेरे आांगन में
चारो तरफ खुशियां लेकर आती
                     – बलवंत सिंह राणा


Wednesday, 12 July 2023

प्रियतम का इंतजार : सपना प्रजापति

प्रियतम का इंतजार
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मेरी आत्मा ने रंग, बारिश की बूंदो संग
महसूस किया जिसे
सर्द हवाओ के झोके, वही गीत गा रहे है।
श्रृंगार करती वृक्षों की लताएँ,

रंग-बिरंगे फूलो के आभूषण धारण
उनके इंतजार में प्रकृति को सजा रहे है।
यहाँ कण-कण प्यासा है,
जिनके दीदार को

ये मेघ उन्ही के आने का
पैगाम ला रहे है 
जिनके नाम से चलती है- साँसे मेरी,
वही प्रियतम आनंदित हो, चले आ रहे है।

जिनका पार न पाया कोई
जो अनंत, अविनाशी है।
जिनके दीदार को ये अखियाँ, 
जन्मों की प्यासी है। 

वही मेरे शिव परमपिता परमेश्वर मेरे महादेव
मेरे सावन के आनंद रूप में चले आ रहे हैं
                      – सपना प्रजापति


Friday, 7 July 2023

मौत जैसे माँ: पुष्पा सिंह "अचला"

मौत जैसे माँ 
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ए मौत! जैसी भी है तू बड़ी प्यारी है 
माँ जैसी तू भी दुनिया से बड़ी न्यारी है 

जीवन रूपी नैया में कष्ट भरे हैं अनंत 
मृत्यु रूपी सैया में सब कष्टों का है अंत 

कब किस पल तू आएगी नहीं किसी को बोध 
विन मोह माया के हरे प्राण वृद्ध जवाँ अबोध 

भाग रहे हैं जो तुझ से उन्हें गले लगाती है 
बुला रहे हैं जो तुझे उन्हें और तड़पाती है

चुपके से आ कर धीरे से कब अपना बनती है 
माँ बन कर अपने आगोश में गहरी नींद सुलाती है 

संघर्ष भरे जीवन का तू ही है अंतिम विराम
 आत्मा की नव यात्रा पुनः चली अविराम 

 तेरी लीला तू ही जाने कब किस पर आएगी
 तेरी राह तके "अचला" कब मुझे गले लगाएगी 
                                          – पुष्पा सिंह "अचला" 
                                             मध्यप्रदेश , भोपाल


Wednesday, 5 July 2023

जीने की ललक : प्रतिभा पाण्डेय

जीने की ललक 
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अफसोस अब होता है,
दिल जार-जार रोता है,
क्यूँ अनसुना कर दिया था उनको,
अजीजों का जख्म नासूर होता है!
तुम अवसाद में थे,
प्रत्यक्ष तौर पर,
कुछ बताना चाहते थे,
शायद दिल को,
हल्का करना चाहते थे !
हराकर मौत को,
जीने की ललक,
हाय ,
रोज हमें जोंक से,
हँसाने की तलब,
मुझसे की थी लिखने की अपील,
इंसान मरने से ना डरे,
सामने मौत हो फिर भी बेखौफ रहे डटे,
हर कोई हँसता रहे,
बुझे-बुझे से ना रहे..!
अब किसी की कोई भी तड़प ,
जानना चाहती हूँ,
अपने लोगों को सुनना चाहती हूँ,
अजीजों से रोज मिलना चाहती हूँ,
नासूर जख्म को भूलना चाहती हूँ |
             – प्रतिभा पाण्डेय" चेन्नई 



Monday, 3 July 2023

आगाज : सूर्यबाला मिश्रा ‘अपराजिता’

आगाज
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जियो ऐसे वतन की 
सरपरस्ती में लहू का एक कतरा 
भी गिरे आगाज हो जाए !
ग़ुलामी के शिकंजे से निकलने 
की इबादत से 
ये मिट्टी चूम कह दो वहीं 
आगाज हो जाए !

मुकद्दर है भला अपना 
जन्म भारत में पाए हैं 
बना दो शान मिट्टी की 
और एक आगाज हो जाये !

जहाँ नदियों को पूजा और 
उनको माँ कहा जाये 
उसी धरती को पूजो 
और एक आगाज हो जाये !

यहाँ श्रीराम और श्रीकृष्ण का 
आना हुआ जैसे 
बनो आदर्श तुम ऐसे 
की एक आगाज हो जाये !

कलम कलाम के जैसी 
यहाँ टैगोर की छवि है
निराला और दिनकर की तरह 
इस देश में कवि हैं 
भुलाकर खुद को तुम खोजो 
और एक आगाज हो जाये!
             – सूर्यबाला मिश्रा "अपराजिता"



Sunday, 2 July 2023

नौ सेना की बेटियां : के. पी. एस. चौहान

नौंसेना की बेटियां
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माई का दुध तो खूब पिया,
अब गाय का दूध पिया करो।
यूं मर-मर के क्या जीना,
ज़रा शेरों की तरह जिया करो।।

अनेक लोग आऐ, 
और चले गए इस दुनिया से ।
मरके भी हो जाए अमर नाम, 
काम कोई ऐसा किया करो।।

यूं मर-मर के क्या जीना,
जरा शेरनियों की तरह जिया करो।।

नौसेना की बेटियां,
         मां भारती की बिंदी है।
कोई दुश्मन सीमां मैं घूस नहीं पाएगा।
    जब तलक ये शेरनियां जिद्दी है।।

हमने तो सिर्फ घूंघट हटाया है सिर से ,
       मान-मर्यादा नहीं तोड़ेंगे।
किसी जालिम ने बुरी नजर,
         जो हम पर डाली।
  उसकी दोनों आंखें फोड़ेंगे।।

सरहद की तरफ जो कदम बढ़ाए तो ,
     उसकी दोनों टांगे तोड़ेंगे।
बार-बार जो सिर उठाया तो,
        गर्दन उसकी मरोडेंगें ।।

गाड़ देंगें जिंदा जमीन में,
उसको कहीं का नहीं छोड़ेंगे।

चूड़ियां पहनना छोड़कर 
इन हाथों में अब कृपाण हमने उठाई है।
मां भारती की रक्षा करने की 
कसम हमने खाई है।।

तिरंगे की तरफ जो उंगली उठाई तो 
हम हाथ उसका काटेंगे।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर-जमीं को 
हम नर-मुंडो से पाटेंगे।।

हम जिएंगे या मरेंगे 
आजाद हमारा वतन होगा।
होगा नाम शहीदों में 
और तिरंगा हमारा कफन होगा।।

तिरंगा हमारा कफन होगा।
तिरंगा हमारा कफन होगा।।
        – आशु कवि के. पी. एस. , चौहान


हाँ मेरी माँ : प्रमिला सैनी

हाँ मेरी माँ
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काजल का टीका लगाकर
मुझे सब से छुपाती थी
हाँ मेरी माँ
मुझे ऐसे नजर से बचाती थी

कभी लोरी कभी कहानी
कभी थपकी भी दे जाती थीं
हाँ मेरी माँ
मुझे ऐसे ही सुलाती थी

कभी लहंगा कभी फ्रॉक
कभी साड़ी भी पहनाती थी
हाँ मेरी माँ
मुझे ऐसे ही सजाती थी

कभी गुड़िया कभी परी
कभी लाडो रानी भी वो कहती थीं
हाँ मेरी माँ
मुझे ऐसे भी बुलाती थी

कभी गुलगुले कभी हलवा
कभी इडली डोसा भी बनाती थीं
हाँ मेरी माँ
मुझे मेरी पसंद का खाना खिलाती थी

कभी ठुमका कभी चुटकुले
कभी जोकर भी बन जाती थीं
हाँ मेरी माँ
मुझ रोती को ऐसे भी हंसाती थी

न मामा न मौसी
न किसी सहेली के यहां जाने देती थीं
हाँ मेरी माँ
मुझे ऐसे जमाने से बचाती थी

कभी अपर्णा कभी लक्ष्मीबाई
कभी नवदुर्गा की बात सुनाती थी
हाँ मेरी माँ
मुझे ऐसे आत्म रक्षा सिखाती थी

कभी रोई कभी खोई 
कभी दर्दों को छुपाती हूं 
हाँ मेरी माँ
अब तेरी गुडिया ऐसे ही यादों में चुप सी रहती हूं
और जिंदगी को जीती हूं
                  – प्रमिला सैनी, कुरुक्षेत्र


परिणाम घोषित

शीर्ष स्थान :– 🥇प्रथम पुरस्कार विजेता : अद्वैत वेदांत रंजन (राशि: ₹1001/–) 🥈द्वितीय पुरस्कार विजेता : सीमा रंगा इंद्रा एवं ज्ञ...